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SAMAY- WAQT

जो  दिखे  ना , पर  है  बलवान 
इसका  अपना  जोर  अलग  पहचान , कमज़ोर  को  कर  दे  उपयोगी  और  धनवान  को बना  दे  योगी। 

इसकी महिमा  चलती  विपरीत  राजा  रंक  हो जाता  समर्प्रित।, खुशहाली  इसकी  मुँहबोली  बहन  तो  दुःख  से  भी  इसका  रिश्ता  गहन । 
कठपुतली नाच  नाचता  आदमी  समय  के संग सब कुछ लाज़मी , दुःख - सुख जो भी  हो  साथी  समय स्वयं में  है  मदमाती।  
सुख का परदा जब ढलेगा  घबराया मनुष्य कब तक लड़ेगा , समय की पाबंदी  बनी ज़िन्दगी,  समय साथ के लिए तड़पेगा। 
है अजीब चक्रव्युह वक़्त का  समय - समय पे उलझी फ़ितरत का , वक़्त बेवक़्त  ही कर ले क़ैद  खोल दे राज़ , चीड़  कर  भैद। 
लाचार है हम सब इसके आगे .....  वक़्त है साहब , पहले भागे , याद रखना , आज तेरा - कल मेरा होगा , समय का हमारी ज़िन्दगी में , पहरा होगा।। 
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- श्राबस्ती गुहाँ बोराह 





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"Maa" TERI YAAD!!

जब भी मौसम बदले तो
तुम याद आती हो ,
थकावट से अकेली बैठी तो
तुम याद आती हो,
पता नहीं वे - वक़्त अचानक
तुम याद आती हो ,
खुशी में भी आँसू  के बुँदे
जैसे चली आती हो।

रसोई में हाथ जले , तो
तुम याद आती हो।
श्रृंगार समय ....  कुमकुम की डिब्बी देखीं
तो तुम याद आती हो .........
पुरानी खोले बक्सों में साड़िया देख
तो तुम याद आती हो ,
अपने सोते हुए बेटी को ताकती 'मैं '
क्योकि तुम याद आती हो।

उनसे रूठी या झगड़ी , याद  तेरी आती है
पड़ोसी के घर .... वंजानो की ख़ुशबू
याद तेरी सताती है ,
शंख की ध्वनि ,घंटी की आवाज़
याद तेरी आती है
तेरे सिखाये रस्मों का हिस्सा
तेरा किस्सा साथ लाती हैं।

कैसे बोलू तेरी .........  कितनी याद आती है ??
बस थोड़ा -थोड़ा  हर दिन ,यादो की मुलाकात होती है
तुम याद की तरह आती हो ,
दो पल में गुम हो जाती हो ,
ज़िन्दगी की वयस्तता को
नए दिशा दे जाती हो।
तेरी हर छोटी मोटी बातें
अब मेरी समझ  आती है ,
अशंख्य प्रश्नों  का  उत्तर
स्वॅम  मुझे  दे  जाती  हैं।

तीज - त्यौहार , जश्न मे
तुम याद आती हो ,
छुट्टियों के लम्बे अरसो में
तुम याद आती हो,
आदत की तरह हर रोज़
तुम याद आती हो ........

"म…

AGYANI - IGNORANT

किस बात का घमंड तुझे ,
किस बात का नशा  .....
ज़िंदगी छोटी सी  और
वक़्त की अपनी भाषा।

कौन है तु . . . क्या तेरी पहचान ,
बतुक बनी जो भी तेरी शान
टूटेगा अचनाक एक दिन, बिन बोले
और खोजना फिर ,मन के दरवाज़े खोले।

दो पल की हसरत , एक दिन की ज़िन्दगी .....
बाँट ले अपना नसीब , एहि बंदगी
थोड़ी राहत तुझे मिले , सुकून मिले ,
हाथो से जो  मिटे गीले शिकवे।

कोशिश ज़रा तू करके देख ना ,
छूटे रास्तो को कहीं तो होगा मिलना।
छोटा सा सफर ओर लम्बा इम्तेहान ;
ज़िन्दगी अनोखी है , अनोखी सौग़ात।

नाम यही छूटेगा , सौहरत भी खो  जाएँगी
काल की हतकड़ी जब  तेरा पता ढूँढ आएंगी
किस बात का घमंड तुझे , किस बात का नशा
ज़िन्दगी छोटी सी, वक़्त की अपनी भाषा।

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श्राबस्ती गुहा बोराह







"ASAMANJAS RISHTEY "

क्या होती रिश्तो की अहमियत  ,
प्यार , दिखावा या  ज़हमत ,
कैसे टुट जाती, डोर रिश्तो क़ी ......
नाकाम बनी  दुआए,  फ़रिश्तो की।

बेग़ैरत ज़ज़्बातो  का सैलाव
अकेला घबराया  दुनिया के खिलाफ ,
न जुबां से  हाय  निकले ,
बनावटी मुस्कान तू ज़रा सिख ले ......

आसानी हो जाए , थोड़ी देर ही सही ,
घुटते रिश्ते वापस कभी आए नहीं।
दबी  हुई  दिल  की  जो  बात  है ,
अब कट रही वक़्त की आवाज़ है ......

रिश्तो को निभाने की आस तो है,
नज़दीक बैठे , दोनों ही चुप है ,
नहीं कोशिश , रिश्तो की मज़बूती की .......
सवाल है अहम्  की , उसकी जीत की।

जीतने  की जंग में कहीं  खो गए है
बीतता लम्हा  , संभाल के रोये है ,
छलावा , दिखावा  कई  मुखौटे पहने .......
कलयुग में मिले , आविष्कारी गहने।

" मेरा - तेरा " सवालों में रुकी है बात .......
कभी जो हमारा था , छूट रहा सांथ ,
एक दूसरे को न समझ पाने का एहसास,
क्या यही है , रिश्तों की टूटने की आगाज़।

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श्राबस्ती गुहा बोराह
















" Umeede - Expectation's "

अब तो बेतुका  लगता है ,
अजीब 'उम्मीदों का साया '...
बनाबटी सा संसार यहां
और ,लोग पहने नकली काया ...

बात हुयी उम्मीदों की  ...
तो बंध  गई  एक इच्छा ,
दोनों हाथ जकड़ कर  जब ,
मैंने कोशिश एक  नया सींचा।

थोड़ा अपना गम मिलाया ,
थोड़ा पराया उन्होँने बनाया ,
फिर दोनों  की मिश्रण से मैंने ...
शब्दों  का यह खेल रचाया।

उम्मीदों की आस बंध जाने दो ,
मेरी इच्छाओं को पास आने दो।
थोड़ा सा  साथ जो तुम दोगे ...
उम्मीदों  के दरवाज़े  खोल दोगे।

एक  प्रयत्न  तो  करो ...
एक प्रयास तो - तुम करो !!
मेरी बेतुकी उम्मीदों का ,
एक आस तो क़ायम करो।

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श्राबस्ती गुहा  बोराह












"EK TASVEER - One Picture"

एक तस्वीर पुरानी बातें याद दिला गई..
जो ज़ख़्म भर गए थे ,
वह ताज़ा कर गई।

मुश्किलें कुछ ऐसी आन पड़ी ...
खोये वक़्त की बाहों में आ गिरी ,
अफ़सोस क्या करें - गम -ए -ज़िन्दगी ,
चंद झूठे इरादों सी बुझी ज़िन्दगी

न पलट के  जाये , न कोई जवाब दे पाए ...
अपनी उलझनों को बस ,
पन्नो में बयान कर पाए।

चलो खैर  मनाये , जो हुआ  अच्छा हुआ
ज़िन्दगी की  रफ़्तार  से   सामना हुआ ...
कुछ टूटे - कुछ फूटे  अफ़साने ही सही ,
चल रही है ज़िन्दगी अब , कोई गम तो नहीं।

ना  दोष  मेरा ,  ना  वक़्त  का  था ,
सिलसिला मेरी लंगड़ी किस्मत का था।
चुप्पी  में  ही  रौनक  सी  लगी ,
बुझा  मन  खाली  हाथ  लौट  चली।

अब सालो गुजर गए हैं ,
परिस्थितियों  के  पैमाने  नए है।
न जाने  कब  यह तस्वीर  सामने  दिख पड़ी ...
आज  फिर  पुराने  यादों  को  कर गए हरी।

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श्राबस्ती गुहा बोराह









KHWAHISH - DESIRE

सपनों  का क्या है ?
यह तो झिलमिलाती रहती है।
दोष तो किस्मत का है ,
जो धोखा दे जाती है . .

अपना होकर भी न होता
मन जाने किस राह चलता . . .
ख्वाहिशओ की ज़ालिम दुनिया ,
अपना माया जाल बिछौता ।

टिकटिकी लगाया वह राह चलता ,
मंज़िल को बस पाना चाहता ,
दौड़ लगी है , आगे बढ़ने की . .
पर पीछे यह क्या,छुटता जाता ।

जीत के भी मंज़िल क्यो , शून्य  !!
रिश्ते क्या अभी भी हैं , बहुमूल्य . . .
अजीब सी कश्मकश  क्यों हैं ??
आँखों के आगे , चकाचौंध  मंद  है।

मंज़िल आकर भी अकेला ,दिल  है।
चुप सा मन , बन बैठा  बोझ  है ,
क्या खोया - क्या पाया  है . .
उत्तर कही अब खो आया है।

बुझा सा  चहेरा  मन संभालता है ,
ख्वाहिशों का क्या है . . . . .
यह तो बस झिलमिलाता है।

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श्राबस्ती गुहा बोराह