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BHRAM EK KOHARA !!

क्या हुआ जो ख़याली है ..
मन मेरा है , सोच मेरी है
खुश हूँ मैं ; इन्हे समझ कर
दुनिया फिर अलबेली है ।

झूठ है या सच्चाई है ,
नहीं जानना क्या गहराई है..
जान गया तो फिर डूब जाऊंगा ,
सोच के मन को कैसे बहलाऊंगा  ।

उम्मीद की  कश्ती को चले जाने दो..
झूठे अफ़सानो को , ख़िल जाने दो ,
बंटा  हुआ सिक्का  जो   दो पहलू  में..
उन एहसासों क़ो छुपे ही रहने दो ।

कांच का सा हैं , अरमान मेरा . .
टूटा तो कब हो पाए अपना ,
ज़ी रहा हूँ  एक   डर से  ..
न हो जाए हक़ीक़त से सामना।

बस  रहने दो  इसी  असमंज में . .
काश - कभी और  दो राही सवालों में ,
जानता हूँ , ज़ी रहा हूँ ख़यालो मे

पर मैं खुश हूँ  ;  हाँ  मैं खुश हूँ। . .

अपने ही भ्रम मेँ, अपने ही भ्रम में।





द्वारा लिखित :  श्राबस्ती गुहा बोरहा





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" Ek Vichar....Ek Soch "

अपनी छाप छोड़ने की कोशिश में हूँ.. 
ज़िन्दगी जीने के तरीको में उलझी  हूँ..  बस कुछ ख़याल घर  कर जाते है, नए अफ़साने जब सामने आ जाते है। 
कुछ सोच विचार मन मे बसे हैं..  दिल दरवाज़े में दस्तक बजे हैं..   ख़याली गुब्बारे फूंक भर जाते हैं , उड़ने की इच्छा में ,जिंदगी दौड़ आते है। 

कैसे बयान करू , अनछुए अनुभवों क़ो  डर से चुप बैठी , बंद पड़े लवो को..  कहीं बोल जाए तो एतबार न होगा, ज़माने भर में ऐतराज़ जो होंगा ।      
आँखे मूंदे है , गहरी साँस  छुपा रखें हैं , बहुत   राज़  मन मेँ बुल बुले जो फुट रहे है  ज़ीने के तरीक़े अब दम घुट रहे हैं । 
अपनी छाप छोड़ने की कोशिश में हूँ ,ज़िन्दगी उलझी हैं  क्यों सुलझाने में पड़ी हूँ, क्यों सुलझाने में पड़ी हूँ।